डॉयबिटीज़ की दुनिया में चावल की भूमिका


हमारी इस दुनिया में 500 करोड़ से भी ज्यादा लोग प्रतिदिन चावल खाते हैं. चावल की हजारों किस्में दुनिया के हर कोने में उगाई जाती हैं, और हर किस्म का एक अलग न्यूट्रिएंट्स प्रोफाइल होता है.
चावल को उगाना काफी आसान है और इसका उत्पादन भी बड़ी मात्रा में आसानी से हो जाता है और इसीलिए इसे कार्बोहाइड्रेट्स का एक बहुत ही सस्ता सुंदर और टिकाऊ सोर्स माना जाता है.
उत्पादन और कीमत के अलावा इसे पकाना भी बहुत ही आसान है, और इन्हीं सब खूबियों की वजह से इसे पूरी दुनिया में चाहा और सराहा जाता है.
इन्हीं सब खूबियों की वजह से दुनिया में ऐसे कई लोग हैं जिनके भोजन में अधिकतर कैलोरीज चावल के consumption से ही आती हैं.
अब जब हम किसी फूड प्रोडक्ट को इतने बड़े पैमाने पर उपयोग में लाते हैं तो न सिर्फ हम उस पर एनर्जी इनपुट के लिए आश्रित हो जाते हैं बल्कि हम उसके साथ कुछ इमोशनल और सोशल कनेक्शन भी establish करते हैं.
इन्हीं भावनाओं के चलते दुनिया में दुनिया के हर कोने में कई कम्युनिटीज में चावल का वहां की लोकल सेरेमनीज में बड़ा हाथ है. कई सोशल और रिलिजियस रिचुअल्स परफॉर्म करते वक्त चावल का इस्तेमाल किया जाता है.
हमारे देश में जब किसी व्यक्ति को सम्मानित करने के लिए टीका लगाया जाता है तो उसके साथ ही चावल के कुछ दाने भी लगाए जाते हैं. जब शादी के बाद बहू पहली बार अपनी ससुराल में कदम रखती है तो उसके पैरों के सामने चावल की एक लुटिया रखी जाती है जिसका तात्पर्य होता है कि जहां भी यह महिला कदम रखे वहां धन–धान्य की कमी न हो.
दरअसल धन शब्द का उत्पादन भी धन्य या चावल से ही हुआ है और वह इसलिए क्योंकि आज से हजारों साल पहले जब मनुष्य ने धन या wealth की कल्पना की तो सबसे पहला wealth भोजन ही था.
अब जब चावल को इतने बड़े पैमाने पर खाया जाता है तो naturally जब किसी व्यक्ति को पहली बार यह अंदाजा होता है कि उसे Type 1 या Type 2 या gestational diabetes है तो उसका सबसे पहला ख्याल होता है कि अब वह चावल खा सकेगा या नहीं.
इसी से मिलते जुलते कुछ अन्य सवाल होते हैं:
डायबिटीज में कौन सा चावल खाना चाहिए?
शुगर में कौन सा चावल खा सकते हैं?
शुगर में कौन सा चावल खाना चाहिए?
शुगर के मरीज कौन सा चावल खा सकते हैं?
डायबिटीज के लिए क्या खाना चाहिए?
डायबिटीज के लिए कौन सा चावल बेहतर है?
यहां हम चावल को लेकर डायबिटीज पेशेंट के मन में उठने वाली इसी तरह की कुछ शंकाओं के बारे में चर्चा करेंगे.
सेहत के लिए सबसे अच्छा चावल कौन सा है?


चावल के एक सामान्य दाने में लगभग 30% वजन bran, germ और बाहरी छिलके (husk) का होता है, और बाकी का 70% वजन एंडोस्पर्म (endosperm) का होता है.
हमारे आसपास के बाजारों में बिकने वाला जो सबसे सामान्य चावल होता है वह अक्सर white rice होता है और उसमें बेसिकली सिर्फ एंडोस्पर्म ही होता है.
लेकिन यदि आप चावल के दाने के न्यूट्रीशनल प्रोफाइल पर नजर डालेंगे तो आप पाएंगे कि सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा – nutritionally speaking – bran और germ मैं होता है जो कि चावल के दाने का लगभग 10% हिस्सा होते हैं.
लेकिन इस हिस्से को चावल की मिलिंग (milling) और प्रोसेसिंग या पॉलिशिंग करते वक्त बड़ी ही सावधानी से अलग कर दिया जाता है, और उसके बाद जो चावल उपभोक्ताओं को ऑफर किया जाता है वह सिर्फ एंडोस्पर्म होता है.
Naturally, उसमें न्यूट्रिएंट्स की मात्रा ज्यादा नहीं होती, और वह दरअसल सिर्फ कार्बोहाइड्रेट्स ही होता है, और इस तरह कि चावल खाने से हमारे ब्लड ग्लूकोस में काफी बड़ा उछाल आ सकता है, इसके साथ ही साथ हमें उस में कुछ विशेष माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की प्राप्ति भी नहीं होती.
लेकिन इस हिस्से को चावल की मिलिंग (milling) और प्रोसेसिंग या पॉलिशिंग करते वक्त बड़ी ही सावधानी से अलग कर दिया जाता है, और उसके बाद जो चावल उपभोक्ताओं को ऑफर किया जाता है वह सिर्फ एंडोस्पर्म होता है.
लेकिन ब्राउन राइस या रेड राइस में यह 10% हिस्सा अक्सर मौजूद रहता है. इसका मतलब है कि कलर्ड राइस वैराइटीज (coloured rice varieties) न सिर्फ हमें ज्यादा न सिर्फ हमें ज्यादा मात्रा में माइक्रोन्यूट्रिएंट्स मुहैया कराती हैं बल्कि वे हमारे ब्लड ग्लूकोस लेवल को बहुत तेजी से बढ़ने से भी रोकती हैं.
ब्लड ग्लूकोस लेवल्स को नियंत्रित करने में फाइबर का बहुत बड़ा हाथ होता है जो कि कलर्ड राइस (coloured rice) में बड़ी मात्रा में मौजूद होता है.
और जैसा कि आप जानते हैं कि जब हमारी ब्लड ग्लूकोस लेवल नियंत्रित होती हैं तो हमारे शरीर में इंसुलिन का प्रवाह भी नियंत्रित होता है और उसकी वजह से हमें हाइपरइन्सुलिनीमिया (hyperinsulinemia) और denovolipogenesis (DNL)और लिवर डिसीसिस (liver diseases) होने की संभावना कम हो जाती है.
The Diabetes Code के लेखक Dr. Jason Fung के अनुसार, जब हम इन्सुलिन लेवल्स को normalize करते हैं तो उससे फैटी लीवर (fatty liver) की शिकायत भी कम हो जाती है. उनका कहना है कि रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट्स – जो कि इंसुलिन के प्रवाह को बढ़ाने में बहुत बड़ा योगदान देते हैं – दरअसल dietary fat से भी कहीं ज्यादा खतरनाक हैं.
रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट्स का बहुत ज्यादा उपयोग करने से हमारे शरीर में denovolipogenesis की प्रक्रिया 10 गुना बढ़ सकती है, जबकि ज्यादा मात्रा में dietary fat खाने से – और कम मात्रा में कार्बोहाइड्रेट खाने से– हैपेटिक फैट प्रोडक्शन (hepatic fat production) में कुछ विशेष परिवर्तन नहीं होता.


जब हम रेड राइस या ब्राउन राइस या कोई भी coloured rice खाते हैं तो उन में पाए जाने वाला फाइबर हमारे शरीर में उस भोजन से प्राप्त हुए ग्लूकोस मॉलिक्यूल के absorption के रेट को कम करता है, और इसके चलते फिर हमारे ब्लड स्ट्रीम में glucose molecules का कंसंट्रेशन बहुत ज्यादा नहीं बढ़ता.
और जब हमारे शरीर में ग्लूकोज की मात्रा कम होती है तो automatically हमारी pancreas को भी कम काम करना पड़ता है और उसके चलते शरीर में इंसुलिन का प्रवाह भी कम होता है.


Wheat Belly के लेखक William Davis का कहना है कि जब हम कार्बोहाइड्रेट्स का जरूरत से ज्यादा सेवन करते हैं तो उससे इंसुलिन का प्रवाह भी बढ़ जाता है, और इसके चलते विसरल फैट (visceral fat) की मात्रा भी हमारी बॉडी में बढ़ जाती है.
यही विसरल फैट आगे चलकर इन्सुलिन रेजिस्टेंस और इन्फ्लेमेशन को बढ़ाने में भी सहायक सिद्ध होती है.
और लगातार कई सालों तक एक्स्ट्रा काम करने की वजह से हमारी पैंक्रियास एक तरह से थक जाती है और तब उसके द्वारा होने वाले इंसुलिन का प्रभाव प्रवाह भी कम हो जाता है और इन्हीं सब समस्याओं का मिलाजुला नाम है: डायबिटीज.
इस पूरे मैकेनिज्म को समझ लेने के बाद यह हम आसानी से समझ सकते हैं के ब्राउन राइस, red rice, या कोई भी कलर्ड राइस वैरायटी खाने से न सिर्फ हमें अपने blood glucose levels को नियंत्रित करने में आसानी होती है बल्कि अपना वजन मेंटेन रखने में भी सहयोग मिलता है.
किस चावल से ब्लड शुगर नहीं होती?


इस सवाल का सबसे सीधा सच्चा जवाब यही है कि ऐसी कोई भी राइस वैरायटी नहीं है – चावल की ऐसी एक भी किस्म नहीं है – जो ब्लड शुगर में थोड़ा बहुत उछाल न लाती हो.
हर किस्म का चावल खाने से ब्लड ग्लूकोस में कुछ ना कुछ उछाल आता ही है; फर्क सिर्फ इतना होता है कि किसी किस्म से यह उछाल कम होता है और किसी से ज्यादा और किसी से बहुत ज्यादा.
चावल खाने की वजह से ब्लड ग्लूकोस में उछाल का मेग्नीट्यूड (magnitude) उस चावल के ग्लाइसेमिक इंडेक्स पर निर्भर करता है.
किसी चावल का ग्लाइसेमिक इंडेक्स जितना ज्यादा होगा उतना ज्यादा उसका ब्लड ग्लूकोस पर प्रभाव पड़ेगा.
दूसरी तरफ़ जितना किसी एक चावल का ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होगा उसका प्रभाव ब्लड ग्लूकोस पर उतना ही कम होगा.
अब प्रकृति में जब चावल पैदा होता है तो उसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स काफी कम होता है, लेकिन इंडस्ट्रियल रिवॉल्यूशन (industrial revolution) के चलते हमने उस नेचुरल चावल के दाने को मिलिंग और प्रोसेसिंग और पॉलिशिंग करने की जो प्रक्रिया पिछले 1 सालों में इजाद की हैं उनके चलते उसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स काफी बढ़ जाता है.
इन सभी बातों से यह साफ हो जाता है कि जिस राइस वैरायटी की प्रोसेसिंग ज्यादा की जाती है उसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स उतना ही बढ़ जाता है, और इसीलिए ब्राउन राइस, रेड राइस, या ब्लैक राइस जैसी राइस वैराइटीज का हमारे ब्लड ग्लूकोस लेवल पर कम प्रभाव पड़ता है.


और इसी वजह से इस तरह की राइस वैराइटीज में फाइबर (dietary fiber) भी काफी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है.
फाइबर कंपलेक्स कार्बोहाइड्रेट्स (complex carbohydrates) का ही एक रूप है और कंपलेक्स कार्बोहाइड्रेट्स खाने के फायदे हमें कई स्तरों पर मिलते हैं.
दूसरी तरफ जब हम रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट्स का सेवन करते हैं तो वह मोटापा आया ओबेसिटी बढ़ाने में कई तरह से सहायक सिद्ध होते हैं.
“In Defense of Food” के लेखक Michael Pollan का कहना है कि अधिकतर लोग आजकल लगभग 50% कैलोरी का सेवन carbohydrates के रूप में करते हैं, और इन रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट्स की एनर्जी डेंसिटी ओबेसिटी बढ़ाने में दो तरह से सहायक होती है:
पहला इनमें फाइबर की कमी होने की वजह से हमें संतुष्टि या Satiety फीलिंग नहीं होती और उसके वजह से हम जरूरत से ज्यादा खाना खा लेते हैं.
और दूसरा जब हम रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट्स खाते हैं तो उसके चलते हमारे ब्लड ग्लूकोस में बड़ी तेजी से उछाल आता है लेकिन थोड़ी ही बात थोड़ी ही देर के बाद फिर वह glucose crash का रूप ले लेता है और उसके चलते हम फिर से कुछ और खाना खाने की कोशिश करते हैं.
और इस सब एक्स्ट्रा भोजन खाने की वजह से फिर हमारा वेट गेन भी होता है और हमें टाइप टू डायबिटीज जैसी शिकायतों की रिस्क भी सहनी पड़ती है.
क्योंकि पुराने जमाने के लोग कंपलेक्स कार्बोहाइड्रेट्स का उपयोग करते थे – क्योंकि पुराने जमाने के लोग प्राकृतिक रूप से उगाए गए चावल के दाने की प्रोसेसिंग काफी कम किया करते थे – इसलिए उनके भोजन में फाइबर की मात्रा ज्यादा होती थी, और उसके चलते पुराने जमाने में मोटापे जैसी शिकायत बहुत कम हुआ करती थी.
रेड राइस बेहतर है या बासमती?


यदि किसी व्यक्ति का लक्ष्य अपने ब्लड ग्लूकोस की लेवल्स को कम करना है – या उन्हें बेहतर तरीके से नियंत्रित करना है – तो बासमती चावल के मुकाबले रेड राइस कहीं ज्यादा बेहतर है.
अब यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि basically रेड राइस और बासमती राइस में काफी फर्क है; जहां बासमती राइस एक लोंग–ग्रेन (long grain) राइस वैरायटी है वही रेड राइस की कोई विशेष साइज नहीं होती.
दूसरी बात यह है कि बासमती राइस की खुशबू लाजवाब होती है. पुराने जमाने में हमारे देश में यह कहा जाता था कि जब गांव के किसी एक कोने में बासमती राइस पक रहा होता था तो उसकी खुशबू पूरे गांव में फैल जाती थी.
यह बेमिसाल खुशबू रेड राइस में नहीं होती.
लेकिन दूसरी तरफ रेड राइस खाने के अपने कई फायदे हैं. रेड राइस में बहुत सारे विटामिन्स और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स होते हैं जो हमारे स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में हर स्तर पर अपना योगदान देते हैं.
उदाहरण के लिए रेड राइस में White Basmati rice के मुकाबले कहीं ज्यादा मैग्नीशियम (Magnesium) पाया जाता है. कई स्टडीज में यह पाया गया है कि रेड राइस में पाए जाने वाले मैग्नीशियम की मात्रा बासमती राइस के मुकाबले लगभग 4 गुना ज्यादा होती है, और जैसा कि आप जानते हैं मैग्नीशियम Muscles, heart, और bone health के लिए बहुत ज्यादा जरूरी होता है.
No doubt, मैग्नीशियम की कमी का ब्रेन हेल्थ (brain health) पर भी काफी दुष्प्रभाव पड़ता है. अब इस एक खूबी की वजह से ही रेड राइस का महत्व हमारी डाइट में काफी बढ़ जाता है, और वह इसलिए क्योंकि आज की दुनिया में अधिकतर लोग मैग्नीशियम की डेफिशियेंसी का शिकार पाए जाते हैं.


मैग्नीशियम के अलावा रेड राइस में काफी ज्यादा मात्रा में Thiamine, zinc, iron और B vitamins की मात्रा भी काफी ज्यादा होती है.
अब यदि बासमती राइस की मिलिंग और प्रोसेसिंग जरूरत से ज्यादा न की जाए तो उसमें भी यह सब गुण बरकरार रह सकते हैं, लेकिन हमारे आसपास के बाजारों में जो बासमती चावल की कॉमन (common) वैराइटीज बिकती हैं वह बहुत ज्यादा प्रोसैस्ड और पॉलिश्ड होती हैं. वह दिखने में तो बहुत सुंदर होती हैं, लेकिन दरअसल उनमें सिर्फ Endosperm या stach ही भरा होता है.
अब कुछ लोगों का यह कहना है कि बासमती राइस का ग्लाइसेमिक इंडेक्स साधारण व्हाइट राइस से कुछ बेहतर होता है, लेकिन यदि यह बात सच भी है तो भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बासमती राइस का ग्लाइसेमिक इंडेक्स रेड राइस ब्राउन राइस इन ब्लैक राइस के मुकाबले कहीं ज्यादा होता है.
इसके अलावा बासमती राइस में कुछ विशेष फाइबर भी नहीं होता जबकि रेड राइस अपने फाइबर की प्रचुरता के लिए जाना पहचाना जाता है.
इसीलिए संक्षेप में यदि किसी व्यक्ति का लक्ष्य है अपने भोजन में बेहतरीन खुशबू वाले चावल को खाना तो उसे बासमती चावल के अलावा और किसी चावल के बारे में नहीं सोचना चाहिए, लेकिन यदि किसी व्यक्ति का लक्ष्य है अपने ब्लड ग्लूकोस लेवल्स को सही तरीके से नियंत्रित करना, तो उसके लिए रेड राइस या ब्राउन राइस या ब्लैक राइस या वाइल्ड राइस कहीं ज्यादा अच्छे अल्टरनेटिव्स हैं.
क्या रेड राइस व्हाइट राइस से बेहतर है?


साधारण व्हाइट राइस के मुकाबले रेड राइस निश्चित तौर पर बहुत ज्यादा हेल्दी (healthy) है और इसका मुख्य कारण है व्हाइट राइस की जरूरत से ज्यादा milling या प्रोसेसिंग या पॉलिशिंग किया जाना.
जैसा कि हम जानते हैं पिछले लगभग 150 सालों के दौरान इंडस्ट्रियल रिवॉल्यूशन (industrial revolution) के चलते व्हाइट राइस की प्रोसेसिंग और पॉलिशिंग जरूरत से ज्यादा बढ़ गई है. लेकिन वहीं रेड राइस की पोस्ट हार्वेस्ट प्रोसेसिंग आज भी काफी कम होती है और इसी एक्स्ट्रा प्रोसेसिंग की वजह से रेड राइस में husk, bran और germ काफी हद तक विद्यमान रहते हैं.
अब एक चावल के दाने में इन तीनों का वजन लगभग 30% होता है, और जो बाकी 70% होता है वह होता है endosperm.
इसी endosperm को पॉलिशिंग की कई प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद हमें बाजार में वाइट राइस के नाम से बेचा जाता है.
आंबेमोहर, अन्नपूर्णा, चंपा, दुबराज, गोविंद भोग, लक्ष्मी भोग, सोनम मसुरी, सुगंधा, और शरबती (Ambemohar, Annapoornna, Champa, Dubraj, Gobindobhog, Laxmi Bhog, Sona Masuri, Sugandha, and Sharbati) जैसी हमारे देश में व्हाइट राइस की दर्जनों बहुत ही पॉपुलर वैराइटीज हैं


लेकिन उनमें से अधिकतर वैराइटीज की प्रोसेसिंग बहुत ज्यादा की जाती है और इस प्रोसेसिंग का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यही होता है कि इस तरह के चावल में ना तो ज्यादा विटामिन या माइक्रोन्यूट्रिएंट्स होते हैं और ना ही फाइबर.
और इसीलिए इस white rice को खाते ही हमारे ब्लड ग्लूकोस में जबरदस्त उछाल आने की संभावना रहती है, जबकि रेड राइस में ब्रायन और जब प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं और इसके वजह से ब्लड ग्लूकोस पर रेड राइस खाने से उतना गंभीर प्रभाव नहीं पड़ता जितना के वाइट राइस खाने की वजह से.
इसके अलावा रेड राइस में कई मिनरल्स और विटामिंस भी होते हैं, और इन्हीं में से एक है एंथोसाइएनिन (anthocyanin).
Anthocyanin compounds एंटी ऑक्सीडेंट एक्टिविटीज (anti-oxidative activities) को बढ़ावा देने में काफी सहयोग करते हैं. एंटीऑक्सीडेंट्स हमारी बॉडी में फ्री रेडिकल्स के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए काफी जरूरी हैं.
अब यह बात सही है कि रेड राइस में ब्लैकबेरीज या वाइल्ड ब्लूबेरिज के मुकाबले कम एंथोसाइन पाया जाता है, लेकिन एड्रेस सेम टाइम उसकी मात्रा व्हाइट राइस जैसे रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट मैं पाई जाने वाली मात्रा के मुकाबले कहीं ज्यादा होती है. और जैसी की अंग्रेजी में कहावत है: Something is better than nothing.


इन सब माइक्रोन्यूट्रिएंट्स का हमारी सेहत पर अच्छा प्रभाव ही पड़ता है. यह सब हमारी कार्डियोवैस्कुलर हेल्थ बेहतर करते हैं और टाइप टू डायबिटीज (Type 2 Diabetes) होने की रिस्क को कम करते हैं.
तो संक्षेप में यह कहा जा सकता है के रेड राइस व्हाइट राइस के मुकाबले कहीं ज्यादा हेल्थी है, और इसलिए उसकी मात्रा हमारे दैनिक भोजन में बढ़ाने से हमें अच्छे परिणाम ही मिलते हैं.
शुगर पेशेंट को चावल खाना चाहिए या नहीं?


अब हमारे देश में जब किसी व्यक्ति को पहली बार डायबिटीज होने की जानकारी मिलती है तो उसके डॉक्टर या फिजीशियन या डायबिटोलॉजिस्ट या एंडोक्राइनोलॉजिस्ट उसे तुरंत ही चावल न खाने की सलाह देते हैं, लेकिन सच तो यह है के diabetic patients प्रतिदिन चावल का सेवन कर सकते हैं परन्तु उसके लिए दो जरूरी शर्ते हैं.
पहली कि वह सही तरह का चावल होना चाहिए – वह प्रॉपर राइस वैरायटी होनी चाहिए – और दूसरी के उसे सही तरीके से सर्व किया जाना चाहिए.
यदि कोई भी डायबिटिक पेशेंट इन दो बातों का ख्याल रखता है तो उसे डेली बेसिस पर चावल का सेवन करने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए.
यहां सही तरह के चावल का मतलब है कोई भी ऐसा चावल जिसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स (glycemic index) बहुत ज्यादा ना हो हमारी इस दुनिया में ऐसे कई चावल हैं हमारे इस दुनिया में व्हाइट राइस, अरबोरियो राइस arborio rice), जैसमिन राइस(jasmine rice) या ग्लूटीनस राइस (glutinous rice) जैसे कई राइस वैराइटीज हैं जिनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स 70 से कहीं ज्यादा होता है.


दूसरे शब्दों में डायबिटिक पेशेंट्स के लिए वह राइस वैराइटीज ज्यादा लाभप्रद हैं जिनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स 60 से कम हो और इस तरह की वैरायटी राइस वैराइटीज में ब्राउन राइस, रेड राइस, ब्लैक राइस के नाम आसानी से गिनाए जा सकते हैं.
दूसरी शर्त है कि इस तरह के चावल को सही तरीके से खाया जाए – सही तरह से सर्व किया जाए.
यहां सर्व करने से मतलब है कि इस तरह के राइस को खाते वक्त उसके साथ बींस और लेंटिल्स और दालों की मात्रा काफी ज्यादा होनी चाहिए. इसके अलावा उस भोजन में सब्जियों की मात्रा भी अधिक होनी चाहिए.
यदि इस तरह के चावल को बहुत सारी दालों और सब्जियों के साथ खाया जाए तो उससे किसी डायबिटीज पेशेंट को बहुत ज्यादा खतरा नहीं होना चाहिए.
इस बात का सबसे बड़ा सबूत है हमारे देश में – और दुनिया के कई कोनों में – चावल का पिछले 5000 सालों से किए जाने वाला सेवन.
उस जमाने में चावल की प्रोसेसिंग बहुत ज्यादा नहीं की जाती थी, और उसके चलते अक्सर लोग ब्राउन राइस ब्राउन राइस राइस वैराइटीज ही खाते थे, और उसके चलते उन्हें टाइप टू डायबिटीज ओबेसिटी की ज्यादा शिकायत नहीं होती थी.


ओबेसिटी कोड के लेखक डॉक्टर जेसन फंग के अनुसार आप जब भी पूरी दुनिया में बनाए जाने वाले कोई भी कंफर्ट फूड पर ध्यान देंगे तो आप पाएंगे कि वह सभी रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट्स है. वह चाहे मैक्रोनी और चीज़ हो या पास्ता हो या आइसक्रीम या एप्पल पाई या mashed potatoes हो या पेनकेक्स.
और इस बात के सबूत हैं कि इस तरह के भोज्य पदार्थ हमारे brain में reward circuits को activate करते हैं जिससे हमें खुशी या आनंद की अनुभूति होती है, और इसीलिए हम आगे चलकर इन रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट्स के प्रति एडिक्टेड (addicted) महसूस करते हैं.
इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट्स प्राकृतिक भोज्य पदार्थ नहीं है, वे ह्यूमन इंजीनियरिंग का प्रोडक्शन हैं.
इन भोज्य पदार्थों में कोई खराबी नहीं है, खराबी है इन भोज्य पदार्थों की प्रोसेसिंग में.
संक्षेप में कोई भी डायबिटिक पेशेंट उस राइस वैरायटी को इत्मीनान से खा सकता है जिसकी प्रोसेसिंग जरूरत से ज्यादा न की गई हो, और जिसे खाते वक्त दालों का और सब्जियों का प्रचुर मात्रा में उपयोग किया गया हो.
राइस में कार्बोहाइड्रेट्स: क्या राइस में कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं?


बायोकेमिक लेवल पर कार्बोहाइड्रेट्स कार्बन, हाइड्रोजन ,और ऑक्सीजन से समायोजित biomolecules होते हैं.
बायोकेमिस्ट्री (biochemistry) में carbohydrates का saccaridesपर्याय माना जाता है. Saccarides मोलेक्युल्स का वो सब ग्रुप है जिसमें Sugars, starch, और सेल्यूलोज (cellulose) पाए जाते हैं.
कार्बोहाइड्रेट हमारे न्यूट्रीशन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. वह लगभग हर तरह के नेचुरल फूड में पाए जाते हैं, और इसलिए यह कहने की जरूरत नहीं है कि वह चावल में भी पाए जाते हैं.
चावल में मौजूद कार्बोहाइड्रेट्स polysaccharide फॉर्म में पाए जाते हैं जिसे सामान्य भाषा में starch भी कहा जाता है.
तो संक्षेप में रेड राइस एक तरह का कार्बोहाइड्रेट ही होता है और इसीलिए रेड राइस में भी हमारे ब्लड ग्लूकोस लेवल में उछाल लाने की क्षमता होती है.
और इस कार्यवाही में रेड राइस अकेला नहीं है; अधिकतर होल ग्रेन में कुछ ना कुछ कार्बोहाइड्रेट पाए जाते हैं. जो फर्क होता है वह सिर्फ यही कि whole grains में complex carbohydrates की मात्रा ज्यादा होती है.


रेड राइस एक complex carbohydrate है क्योंकि फसल काटने के बाद इसकी प्रोसेसिंग ज्यादा नहीं की जाती. दूसरी तरफ व्हाइट राइस की प्रोसेसिंग इतनी ज्यादा की जाती है कि उसका bran और germ लगभग गायब हो जाता है, और इसके चलते हमें सिर्फ एंडोस्पर्म (endosperm) वाला हिस्सा ही हासिल होता है.
यह एंडोस्पर्म सिर्फ starch है और इसका हमारे ब्लड ग्लूकोस की लेवल पर काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और इसीलिए यह समझना आसान है कि जब कोई व्यक्ति वाइट राइस खाता है तो उसके ब्लड ग्लूकोस पर रेड राइस खाने की अपेक्षा कहीं ज्यादा गंभीर प्रभाव पड़ता है.


तो संक्षेप में, रेड राइस भी एक तरह का कार्बोहाइड्रेट है लेकिन complex carbohydrate होने की वजह से इसका ब्लड ग्लूकोस लेवल पर प्रभाव काफी कम होता है, और इस प्रभाव को सही तरह की दालों और सब्जियों के साथ मिलाकर खाने से और भी कम किया जा सकता है.
“Leave something on your plate… ‘Better to go to waste than to waist”
― Michael Pollan
Don’t eat anything your great grandmother wouldn’t recognize as food.
Michael Pollan